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Wednesday, 11 February 2015

कोशिशे

ऐसे लगता है जैसे अंदर ही अंदर एक दिल काँच के मानी टूट ता जा रहा है और उसी के टुकड़े सीने मे चुभ रहे हो और फिर गले मे आते है खलिश बनके जब किसी गुफ्तगू को परवाज़ देने की कोशिश करता हूँ! Puzzles की तरह अनंत कोशिशे करता हूँ सुलझाने की पर जैसे सूरज कैसे बाज़ आ सकता है अपने पाबंद दस्तूर से वैसे ही एक वो खालिश के टुकड़े अटकते है हलक़ मे! दरिया-ए-नील से भी गहरे ख़यालो मे डुबकिया लगती मेरी नफ़ज़ कभी भूल जाती है दोनो जाहानो मे से पहले जहाँ को जिसका भी सफ़र तेय करता है, गुमराह ज़िंदा लाश बनकर नही एक अफ़ज़ल और बेहतर तरीक़ो से जीना पड़ेगा!

ज़िंदगी की इसी जद्दोजेहेद मे ख़याली पुलाओ को पका लेता हूँ, पर ख़ाता नही हूँ!

कोशिशे रहेंगी बेहतर बनने की!

खुदा के साथ साथ खुद को भी खुश रखने की!




Monday, 9 February 2015

Rise Above Hate

ये दुनिया नफ़रतो का ढेर है, बिन ने निकलोगे तो हज़ारो मिलेंगी! तुम अपनी नफ़रते छांट लो और तुमसे अलग सोचने वाले अपनी नफ़रते और आपस मे लड़के रहना! ना वो तुम्हारी बात समझ पाएँगे ना तुम उन्ही बात! और ऐसे लड़ते - लड़ते ख़तम हो जाना!


पर क्या रिश्तो मे भी ऐसा ही होता है? बिल्कुल नही! तुम थोड़ा मेरा एतबार रखो, और मे तुम्हारा बावजूद इसके के गुंजाइश बहुत है फ़ास्लो मे, थोड़े कदम तुम बढ़ाओ, तुम हम बढ़ाए!


खैर! गुंजाइशे रखनी पड़ती है हर चीज़ मे!

कोशिशे रखेंगी किसी का दिल ना दुखे!

सच से तो हमेशा वास्ता ही है, पर चाहे तुम निगल सकते हो, कोई और नही!

तो सच भी वक़्त के मुंतज़ीर रहता है, याद रखे!


[Img Source : http://cmster.com/media/jn1ave5tTldLbUyRLV8xyiegmiGPauaFRtI3a14uGMJTbKR4Lx3EGj8AJUxNXoSi.jpg]

Monday, 5 January 2015

1 जनवरी 2015

नये साल के कपड़े पहन लिए है. चलो दुविधाओ से मुक्त, नयी दिशाओ को पंख लगाने के लिए 2015 गया है. कल मुझे बहुत बुरा लग रहा था के 1 जन्वरी जो छुट्टी घोषित थी कंपनी मे पर क्यूंकी हमारा सपोर्ट प्रॉजेक्ट है मतलब 24/7 वक़्त मे क्लाइंट के साथ सहायक रहना है. आज मुझे जाना है दफ़्तर चाहे कितनी ही घिंन कर लो. कल की पार्टी मे जो नाचे थे, टाँगे अभी भी दुख रही है. देरी से उठा था पर ऑफीस जाने मे भी अभी कुछ वक़्त है. पर वो भी खाने, नहाने, मेसेजस का जवाब देने मे दर्याफ़्त हो चुका था. Whatsapp के सारे Messages भी नही पढ़े थे पर उसका कोई मतलब भी नही था, सब एक ही जैसे थे.

बहुत आजिसी है के नये साल के पहले दिन मे ऑफीस जाना पड़ रहा है. शायद कुछ ही ऐसे बद-बदनसीब होंगे जिनके साथ ऐसा सुलूक मुनासिब होता है. गुस्सा भी बहुत है, पर वो कहते है ना नौकरी और औलाद के सामने किसी की नही चलती. तो कितनी भी रुसवाई हो, जाना पड़ रहा है..
Cab आई लेने के लिए.. .Evening shift थी और ये मनहूस मौसम भी इतना ज़ुल्मी हो रहा है, हल्की हल्की बारिश और शून्य उमस. मजबूरी साहब!

ऑफीस के गेट से मे जब दाखिल हुआ तो जो मेरा डी तफ़तीश करने वाले सेक्यूरिटी गार्ड्स वही थे. बारिश से जो गंदे जूते के कदम और छींट फर्श पर बाक़ी रह गये थे, उससे साफ करने वाली बूढी औरत जो Cleaning स्टाफ वाली Dress मे थी. वो भी वही थी. अपने हुलिए और मूह-हाथ ढोने के हिस्सब से वॉश-रूम की और बड़ा. तो वॉशबेसिन और पेपर रोल को अपनी जगह रखने वाल लोग वही थे. रोशनी कम थी. स्टाफ भी कम था. मतलब बिल्कुल ना के ही बराबर.
सारे मेल्स चेक करके जब लंच करने कॅंटीन मे गया, वो लोग भी वही थे.
सब तो वही थे तो क्यू मुझे मेरी बदनसीबी का रोना रहा था. मेरी ऑफीस के सहकर्मी नही थे पर वही सब थे.

कुछ पुराने पड़े कंप्यूटर्स और वाइरिंग को दुरुस्त और चेक करने वेल लोग भी वही थे. उन सब की शकल की लिखावट मेने पढ़ी नही,पर सच तो ये है के मेरी शाकले पढ़ने की हिम्मत भी नही हुई. मे तो सिर्फ़ एक दिन के ही मजबूरन मोजूद्गी से इतना खफा था. बेचारे ये सब लोग जो हुमारे सपोर्ट मे सपोर्ट करते है. अगर हम मे से एक भी शख़्स को रात को आना पड़ता है, तो ये बेचारे भी तो आते है.
Coorporates का हिसाब-किताब इसलिए भी मुझे नही पसंद.
पर ये मेरी ख़ुशनसीबी है ये मेरी पयदैश एक अच्छे और पढ़े-लिखे कुनबे मे हुई है. अच्छी शिक्षा से इतना फरक पड़ सकता है, आज उसका ये चेहरा भी देखना पड़ेगा. मेरे खुशनसीब होने का स्लीडेशोव ज़हेन के सामने झलकने लगी. पर अंदर एक खाला सी हुई के इतना फरक क्यूँ? काश मेरी पेदईश कमतर घराने मे होती तो क्या मे कंप्यूटर के सामने वाली सीट पे सुकून से बैठ पता या 10 घंटे खड़े रहकर सबके डी कार्ड की तफ़तीश पड़ती. इतनी एहमियत भी होती नौकरी की अगर इतनी आसानी सी मिल जाती.
जब मे 31 डिसेंबर को नाच रहा था और खुशी सी झूम रहा था तब आधा जाग अपने पेट पालने के लिए काम कर रहे थे के उसे रोज़ वो भूके ना सोए.

नया साल अब अच्छी सोच के साथ गुज़रेगा J

Tuesday, 21 October 2014

लफ्ज़

बड़ा घिसा था पेन को मेने अंधेरे से घुलसी उस चाँद के रोशनी मे! एक अजीब से उत्साह उकरने लगता है लिखते-लिखते के रात का पता लापता-सा हो जाता था और मुझे कोई फरक भी नही पड़ता..मे बेहोश मदहोश..अपने ख्यालो की मौजो मे कश्ती ताएराता रहता.. मे बस एक बेबाक बेधड़क सिपाही की तरह अल्फाज़ो को आज़ाद करके..उन्हे काग़ज़ पे काली स्याही के सुलझने वाले गुच्छे बना लेता था! 

ज़्यादातर जुड़ने वाले लफ्ज़ मेरे ज़िंदगी के दफ़्न हुए वकीये होते थे!

पर आजकल अजीब सा खाल है.. मेरी ज़िंदगी को लेकर.. रूठ गये है.. वो क़लम, वो काग़ज़ और वो ख़याल मुझसे.. ना जाने क्यूँ दस्तक ना देते अकेलेपन मे मेरा.. क्या धोखा दिया मेने या बेवफा कर दिया उसे जज़्बे के प्यार को! नफ़रत नही है.. शायद वक़्त से डर गये है..और चुप के बैठे है किसी कोने मे!
मे भी वाकिफ़ हू और जाहिल हू के इस तालीम मे अपनी खूबी को पीछे कही छोड़ता जा रा हूँ!
फिर वापस एक माचिस की तिल्ली जालायी है..इसी के घरोंधे मे और वादा है मेरा ख़यालो से के भरे गुबारो की तरह यू ही आसमान मे गायब ना होने दूँगा.. बना लूँगा एक तस्वीर तुम्हारी काग़ज़ो मे अक्सर!