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Wednesday, 24 June 2015

One Sleepless Night.

You can only sleep when your heart is at complete rest and ease without any curiosity and futile convergence. I don't even why I am wasting so much of my night thinking much about myself. Basically the train of thought and the curiosity to reach at the end of the tunnel of thought makes me paranoia results is the insomniac nights. But tonight its kinda different, today I haven't thought about the life I am going to lead or reality of universe, human, religion but work. Not exactly the career but work that is been forgotten at the core in the course of prioritizing the personal life first. J. Krishnamurty was right as he said correctly your actions are somehow perceived by the others experience. You hear the experience of them regarding the fatigue work culture and disgraced personal life. With the eyes of other, you built your own layer of perception to these stuff and pre plan the actions. Actions which is less motivated by the present moment of yours but the past experience of others. So, I tried to much more priority to personal life than professional as i don't want to burden myself with work. But actually there is no much burden as such. this attitude of mine makes me lazy and less bothered to come up with completeness and edgy output. I have been lagged pretty much with the people with same level as mine. I would also like to blame on the my incompetency to focus, think and do the necessary actions. I miss to have a conversion that is worth for me in developing ideas and ability to grasp things properly. I should also need to work on cleverly approach while working than "no! I won't do that!". I will never do that that won't say that i won't do that. That's the difference.
One of the most committed mistake I have done is skipping decisions. You never saw the opportunity and decision folded in between while you are carelessly absurd about those things. There are multiple times i should need to care of my work and skill flow. There is nothing like big opportunity. Opportunity is opportunity and a miss is a miss. In the ideal case, If you're missing an opportunity you would be probably dealing with another one. I somehow loses small opportunity that after some time becomes a big opportunity. I should make decision at that point of time.
Some colleague corrected and guided me about focussing in work and learning. Also, helped me to how to rid out of problem and hindering help at the cumbersome of problem.

I have some decisions. Though ruined my whole night thinking, regretting and atlast, waking up! Its never be too late. Be confident. If problems are lock, confidence is always a public key. Play! Try to get and complete the work asap. Whatever the bulk of work given to me, i will be completed as soon as possible with a short time frame and keeping milestones everyday. think. Do. Realize. Take action.

Mohd. Ali said it right you can never achieve goal in one day. Make small small goal. Walk feet by feet. Remember to trace the feet and you'll reach the destiny.

Friday, 27 March 2015

हर शाम के बाद अंधेरा

अब ये शहर काटने को दौड़ता है। स्ट्रीट लाइट्स की छपाई से उतार आने वाली मेरी ही परछाई मुझसे हज़ारो सवालो की नुमएन्दे छोड़ देती है। हज़ारो जवाब तलाशती है! ना तो अब मुझसे भीड़ दिखाई देती है, ना गाड़िया के हॉर्न और ना ही लोगो की बात-चीत की भिन भिनाति हुई आवाज़े। हर चाल और हर शे के साथ नीचुड्ता जाता है मेरे सुन से पड़े चेहरे का रंग। मेरी आँखे कुछ खोखले से ज्ञान के पीछे निरंतर दौड़ने मे ख़स्ता हो गयी है। रंगत बदल गयी है इन आँखो की शक्ल की। ये उस काले रंग के तालाब जैसी हो गयी है जिसमे इंडस्ट्रीयो का ज़ेहर छोड़ दिया जाता है और इस वजह से शायद कोई शख्स हिम्मत भी नही करता इसमे गौता लगाने का.. खुद मे भी नही!

Friday, 13 February 2015

एक वक़्त ऐसा भी था

एक वक़्त था मेरे बचपन का, जब हम मोबाइल, टेबलेट, लॅपटॉप से अंजान से और कंप्यूटर के नाम पे सिर्फ़ Solitaire और M S Paint एस्तेमाल करते थे और वही जानते थे. पर ना आजकल की तरह "बोर हो रहा हू!" वाला पेट डाइलॉग नही हुआ करता था. तब चाहे देश और हम टेक्नालजी मे कम थे पर वक़्त के मामले मे बड़े अमीर हुआ करते थे.
मे तोड़ा बहुत पैसे बचा के कॉमिक्स लाया करता था, कही जगह पे तो रेंट पे भी मिलती थी और घर पर बाल-भास्कर छोटू-मोटू ब बहुत सारी इकखट्टा हो गयी थी महीने-दर-महीने तो पहले जो मे खरीद लेता था..उसी अंतराल के आख़िरी दीनो मे कॉमिक्स रेंट पे लाया करता था. बहेरहाल, वो चाचा चौधरी की कहानिया जिनका दिमाग़ कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है, साबू की ताक़त, बिल्लू जैसा तो मे बड़ा होके बनना चाहता था. उसके साइकल पे स्टंट कॉपी करने के चक्कर मे हाथ पैर तुढवा के आया..पिंकी बड़ी सयानी थी, नागराज, फॅनटम दुश्मनो को मार डालते थे. चंपक. बालहंस. और ना जाने क्या क्या! एक मज़ेदार से दुनिया थी वो भी. और सब मिल कर एक दूसरे को किससे सुनाया करते थे! ये हुआ वो हुआ और कॉमिक्स एक्सचेंज हुआ करती थी.

शेख चिल्ली के किससे, अकबर-बीरबा, पंचतंतरा.. बोरियत तो अब होती है सब कुछ है अपने पास!

पहले पढ़ाई के नाम पे शायद न सी ई र टी की पतली-पतली किताबे थी पर समझदारी और संजीदगी के लिए बहुत कुछ हुआ करता था. ना कोई डबल मीनिंग ना गंदे जोक्स. बस Time-pass के लिए मज़ेदार और रोमांचक किससे कहानिया.

Wednesday, 11 February 2015

कोशिशे

ऐसे लगता है जैसे अंदर ही अंदर एक दिल काँच के मानी टूट ता जा रहा है और उसी के टुकड़े सीने मे चुभ रहे हो और फिर गले मे आते है खलिश बनके जब किसी गुफ्तगू को परवाज़ देने की कोशिश करता हूँ! Puzzles की तरह अनंत कोशिशे करता हूँ सुलझाने की पर जैसे सूरज कैसे बाज़ आ सकता है अपने पाबंद दस्तूर से वैसे ही एक वो खालिश के टुकड़े अटकते है हलक़ मे! दरिया-ए-नील से भी गहरे ख़यालो मे डुबकिया लगती मेरी नफ़ज़ कभी भूल जाती है दोनो जाहानो मे से पहले जहाँ को जिसका भी सफ़र तेय करता है, गुमराह ज़िंदा लाश बनकर नही एक अफ़ज़ल और बेहतर तरीक़ो से जीना पड़ेगा!

ज़िंदगी की इसी जद्दोजेहेद मे ख़याली पुलाओ को पका लेता हूँ, पर ख़ाता नही हूँ!

कोशिशे रहेंगी बेहतर बनने की!

खुदा के साथ साथ खुद को भी खुश रखने की!




Monday, 9 February 2015

नक़ाब

हो रहा बुज़ुर्ग मेरे अब्दर का बचपन. जो कल तक ज़मीन पर रोया था बिलक कर. लोगो से बोलता हू ज़ख़्मी भी है आजकल मुस्कुराहट मेरी मुझसे बात करो पर नक़ाब उतार कर!!!

Rise Above Hate

ये दुनिया नफ़रतो का ढेर है, बिन ने निकलोगे तो हज़ारो मिलेंगी! तुम अपनी नफ़रते छांट लो और तुमसे अलग सोचने वाले अपनी नफ़रते और आपस मे लड़के रहना! ना वो तुम्हारी बात समझ पाएँगे ना तुम उन्ही बात! और ऐसे लड़ते - लड़ते ख़तम हो जाना!


पर क्या रिश्तो मे भी ऐसा ही होता है? बिल्कुल नही! तुम थोड़ा मेरा एतबार रखो, और मे तुम्हारा बावजूद इसके के गुंजाइश बहुत है फ़ास्लो मे, थोड़े कदम तुम बढ़ाओ, तुम हम बढ़ाए!


खैर! गुंजाइशे रखनी पड़ती है हर चीज़ मे!

कोशिशे रखेंगी किसी का दिल ना दुखे!

सच से तो हमेशा वास्ता ही है, पर चाहे तुम निगल सकते हो, कोई और नही!

तो सच भी वक़्त के मुंतज़ीर रहता है, याद रखे!


[Img Source : http://cmster.com/media/jn1ave5tTldLbUyRLV8xyiegmiGPauaFRtI3a14uGMJTbKR4Lx3EGj8AJUxNXoSi.jpg]

उजाला नही

ग़लती की थी वो लिखे हज़ार खत तुम्हारे हवाले ना सही आग के हवाले कर दिए थे.
बस यही सोचकर के सोच तो मिलती नही है ज़िंदगी कैसे मिलेगी :)

अब समझ मे ये नही आता. उन खातो के बुरादो का क्या करू जिस की जलाई हुई यादे अभी तक सवाल तलाश करती है.

वो कहते है ना आँखे बंद करते हो तो अंधेरा आता है उजाला नही...

Monday, 12 January 2015

डाइयरी

ग़लती की थी वो लिखे हज़ार खत तुम्हारे हवाले ना सही आग के हवाले कर दिए थे.
बस यही सोचकर के सोच तो मिलती नही है ज़िंदगी कैसे मिलेगी
अब समझ मे ये नही आता. उन्न खतो के बुरादे का क्या करू जिस की जलाई हुई यादे अभी तक सवाल तलाश करती है.

वो कहते है ना आँखे बंद करते हो तो अंधेरा आता है उजाला नही...

Sunday, 11 January 2015

प्यार करे

रंजिशे-ए-सरहद को छोड़ो, चलो एत्तेहाद करे,
प्यार करे.
निगाहो से गिरादे दफ़तन रंजिशो के पर्दे..
इज़हार करे,
प्यार करे.
मोहब्बत मे कहा देखे जाते ऩफा-नुकसा(न)
एतबार करे,
प्यार करे.

एक फिराक़

सबका पता नही पर ज़्यादातर लोग एक उम्र मे आके कही अंजान जगह मे भाग जाने की साची फिराक़ मे रहते है.. खैर, वो शायद दिलो के खलिश को शब्दो मे ज़ाहिर नही कर पाते पर अंदर एक बवंडर पनपता रहता है. पर क्या करे..रिश्ते, मजबूरियो की बेड़िया बंदिशे बनकर एक पिंजरे तक मे जीने की आज़ादी देते है. वो आज़ादी जो मूह पर हँसी लेपने की बुरी आदत भी सीखा देती है. आजिसी का दरिया कभी करवाते पलट ता थोड़ी है.
काश गुमनामी का कोई समुंदर होता और उमसे गोते लगाकर डूब जाना भी आसान होता. तो गुम हो जाते एक अपनी-अपनी कहकशाओ मे.

और हां! ये अंदर की बात है किसी को बताना नही. श्श्श्!!

Monday, 5 January 2015

1 जनवरी 2015

नये साल के कपड़े पहन लिए है. चलो दुविधाओ से मुक्त, नयी दिशाओ को पंख लगाने के लिए 2015 आ गया है. कल मुझे बहुत बुरा लग रहा था के 1 जन्वरी जो छुट्टी घोषित थी कंपनी मे पर क्यूंकी हमारा सपोर्ट प्रॉजेक्ट है मतलब 24/7 वक़्त मे क्लाइंट के साथ सहायक रहना है. आज मुझे जाना है दफ़्तर चाहे कितनी ही घिंन कर लो. कल की पार्टी मे जो नाचे थे, टाँगे अभी भी दुख रही है. देरी से उठा था पर ऑफीस जाने मे भी अभी कुछ वक़्त है. पर वो भी खाने, नहाने, मेसेजस का जवाब देने मे दर्याफ़्त हो चुका था. Whatsapp के सारे Messages भी नही पढ़े थे पर उसका कोई मतलब भी नही था, सब एक ही जैसे थे.

बहुत आजिसी है के नये साल के पहले दिन मे ऑफीस जाना पड़ रहा है. शायद कुछ ही ऐसे बद-बदनसीब होंगे जिनके साथ ऐसा सुलूक मुनासिब होता है. गुस्सा भी बहुत है, पर वो कहते है ना नौकरी और औलाद के सामने किसी की नही चलती. तो कितनी भी रुसवाई हो, जाना पड़ रहा है..
Cab आई लेने के लिए.. .Evening shift थी और ये मनहूस मौसम भी इतना ज़ुल्मी हो रहा है, हल्की हल्की बारिश और शून्य उमस. मजबूरी साहब!

ऑफीस के गेट से मे जब दाखिल हुआ तो जो मेरा ई डी तफ़तीश करने वाले सेक्यूरिटी गार्ड्स वही थे. बारिश से जो गंदे जूते के कदम और छींट फर्श पर बाक़ी रह गये थे, उससे साफ करने वाली बूढी औरत जो Cleaning स्टाफ वाली Dress मे थी. वो भी वही थी. अपने हुलिए और मूह-हाथ ढोने के हिस्सब से वॉश-रूम की और बड़ा. तो वॉशबेसिन और पेपर रोल को अपनी जगह रखने वाल लोग वही थे. रोशनी कम थी. स्टाफ भी कम था. मतलब बिल्कुल ना के ही बराबर.
सारे मेल्स चेक करके जब लंच करने कॅंटीन मे गया, वो लोग भी वही थे.
सब तो वही थे तो क्यू मुझे मेरी बदनसीबी का रोना आ रहा था. मेरी ऑफीस के सहकर्मी नही थे पर वही सब थे.

कुछ पुराने पड़े कंप्यूटर्स और वाइरिंग को दुरुस्त और चेक करने वेल लोग भी वही थे. उन सब की शकल की लिखावट मेने पढ़ी नही,पर सच तो ये है के मेरी शाकले पढ़ने की हिम्मत भी नही हुई. मे तो सिर्फ़ एक दिन के ही मजबूरन मोजूद्गी से इतना खफा था. बेचारे ये सब लोग जो हुमारे सपोर्ट मे सपोर्ट करते है. अगर हम मे से एक भी शख़्स को रात को आना पड़ता है, तो ये बेचारे भी तो आते है.
Coorporates का हिसाब-किताब इसलिए भी मुझे नही पसंद.
पर ये मेरी ख़ुशनसीबी है ये मेरी पयदैश एक अच्छे और पढ़े-लिखे कुनबे मे हुई है. अच्छी शिक्षा से इतना फरक पड़ सकता है, आज उसका ये चेहरा भी देखना पड़ेगा. मेरे खुशनसीब होने का स्लीडेशोव ज़हेन के सामने झलकने लगी. पर अंदर एक खाला सी हुई के इतना फरक क्यूँ? काश मेरी पेदईश कमतर घराने मे होती तो क्या मे कंप्यूटर के सामने वाली सीट पे सुकून से बैठ पता या 10 घंटे खड़े रहकर सबके ई डी कार्ड की तफ़तीश पड़ती. इतनी एहमियत भी होती नौकरी की अगर इतनी आसानी सी मिल जाती.
जब मे 31 डिसेंबर को नाच रहा था और खुशी सी झूम रहा था तब आधा जाग अपने पेट पालने के लिए काम कर रहे थे के उसे रोज़ वो भूके ना सोए.

नया साल अब अच्छी सोच के साथ गुज़रेगा J

Wednesday, 31 December 2014

Happy New Year के माइने

नया साल आने है वाला है! वो भी अपने आख़िरी लम्हो मे है..कुछ घंटो की दूरी बाक़ी है! उग्ग जाएगा नया सूरज भी, नयी-ताज़ा हवाए लेकर! कुछ नही तो बस यही सोच कर नया समझ लो के एक उम्मीद ही बाँध जाती है! भ्रम रहता है की 'ऑल इस वेल'! खुशियो का प्रजनांन् ऐसे ही तो होता है.. "Which goes around comes around" वाला सिद्धांत! खैर, अभी अभी तो आदत बनी थी पन्ने की शुरुवात मे 2014 लिखने की! अब फिर से नयी आदते डालनी पड़ेगी! जल्दी उत्ुंगा, exercise करूँगा, ये करना है वो करना है ये करूँगा वो करूँगा और भी ना जाने क्या-क्या फलाना धिमाका!
जिसे "New Year Resolution" की प्रवर्ती दे दी जाती है! जिससे में इंग्लीश मे कहना ही ज़्यादा सही समझता हू, क्यूंकी "नये साल के संशोधन" काफ़ी हद तक संविधानी सा लगता है!
मुद्दा ये है नया साल आने वाला है! वक़्त का F5 बटन जो ज़िंदगी के कीबोर्ड पे दबाया जाए यही सोच के रोज़-मररा के मेरे ज़ंग या अटके पड़े Applications मे सुधार आ सके!
चलो में भी तुम सबको . कर देता हूँ "Happy new year 2015" और 10 से 1 तक़ की जो गिनती मुझे खामोशी से बोलनी थी वो मेने अपने मन मे ही बोल ली!
मेने Advance मे इसलिए भी विश कर दिया के आपके पार्टी और नशे की आगोश मे ज़रा भी खलल ना पड़े. खैर, मुझे भी चाँद और हवाओ से बाते करने पड़ेंगी और ज़िंदगी से भी झूठी मूटी कसमे खानी पड़ेगी जैसे मेरी प्रेमिका से 2-4 दिन ना मिलने या महीने मे कोई फिल्म ना दिखने पर की जाती है!
"I promise" का रट्टा मार मार कर!

नया साल मुबारक!
Happy New Year!
नया साल का मतलब सबके लिए एक जैसा नही होता! समझदार लोग रेज़ल्यूशन ऐसे बनाते है जिनपे साल भर तक बरकरार भी रहा जा सके! वो धीरे धीरे करके अपने रेज़ल्यूशन्स को आकार देते है! ऐसे लोगो को बात का बतंगड़ बनाना पसंद भी नही होता! ना निकम्मे अटाले - बस वक़्त और काम के पाबंद! ये वही है जो मुस्कुराते रहते है और अपने मज़े की सीमाओ मे रहते है! जिन्हे मस्खरे लोग 'Ambitious', घरवाले या रिश्तेदार 'ये कुछ करके दिखाएगा' की संगया देते है! ना की अल्टप्पे की गेंद हर कही उछाल दी!
कुछ लोग बहुत ही नकारात्मक होते है! ऐसे ही मेरा एक बेहद नकारात्मक और अंधकारी व्यक्तित्व है मेरा कज़िन. जिससे हर दिन कारखाने से निकले डब्बो की तरह लगते है! एक समान! अंदर से भी और बाहर से भी! हमेशा कहता है जब हम उसे न्यू एअर की खुशी पर साथ मे चलने को कहते है की "हमे तो खुश होने की बजाए, दुखी होना चाहिए. हम सब की ज़िंदगी का एक और साल यूही भस्म हो गया"! फिर हमे भी लगता था के एक और साल ख़तम और हम मौत के और करीब पहुँचते जा रहे है! ये सिक्के का नीचे वाला पहलू है, जब सिक्का उछाल कर हार जीत का फ़ैसला होता है, जब नज़र की सामने वो जीत वाला पहलू तो दिखाई और सुनाई मे पड़ता है पर परछाई मे छुपा हुआ नीचे वाला पहलू नही दिखता!
पर ज़्यादातर लोगो के लिए नये साल के माइने नयी उम्मीदे, नये कपड़े, नये तजुर्बे और नये लोग है.
उनका तो रेज़ल्यूशन्स से सिर्फ़ कुछ वक़्त का वास्ता होता है! फिर रेज़ल्यूशन भाई "अल्लाह हाफ़िज़"! ख़यालो की तरह उड़ जाता है और अगर ग़लती से दीवार पर पायंट्स बना कर चिपका भी लिया तो वो आती जाती हर कुछ फ़िल्मो की तरह नज़र अंदाज़ होता है! और धीरे धीरे वो खुद ही अपने आप को फाड़ना शूरू कर देता है!

कुछ लोगो के लिए न्यू एअर मतलब आज़ादी को मानने का एक और दिन! दारू मे बहता समा, लाउड और एलेक्ट्रॉनिक म्यूज़िक मे मदहोश चीखे! ऐसे लोगो ना आगे की सोचते है ना पीछे की, ऐसे लोग आज की सोचते है, आज को जीना और आज को पीना! बस!
खैर, अच्छे से मनाओ नया साल! खुश रहो! लोगो को खुश करो! खुशी मिलेगी!

Saturday, 27 December 2014

प्यार निशब्द

प्यार कही भी और कभी भी पनप सकता है..
इश्क़ की अंकुरित बीज कही भी कोपल बन सकते है..
प्यार को पानी की संगया भी दे सकते है..
कही भी जगह बना है..
कही भी पल जाए..
और ज़रूरत पड़े तो बवाल भी बन जाए.
प्यार जिससे ना विज्ञान सुलझा पाया है.. ना कोई ग्यानि..
और ना समाज समझ पाया है..

प्यार खूबसूरत है और खूबसूरती नही देखता..
ना तराश्त है लफ्ज़..
सच कहते है प्यार अँधा होता है.. देखा सुना नही जा सकता..
सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है.. आहट पहचानता है..
बस जहा जगह दर्याफ़्त होती है.. जो वही रिस्ता जाता है..
नया रिश्ता बनता रहता है.
ईत्र है. एक मदहोशी है.
एक ख्वाब है.. और उसकी तबीर है.
रोग भी है. इलाज भी है.
ज़ख़्म भी है.. इजात है.

भूल जाता है कौनसा जिस्म पहना हुआ है..  कौनसी जात औडी है..
तब दुनिया मे सिर्फ़ दो नही..
एक ही जिस्म बाकी रह जाता है.. और उसी मे घुले हुए हिस्से.
शिकायते भी नही करता.
खामोशी को पढ़ता है.
आहट को सुनता है.

ऐसा ही होता है प्यार, बस ऐसे ही होता है प्यार!

[Img source : https://img0.etsystatic.com/012/0/6673596/il_570xN.444067078_abqv.jpg]

Wednesday, 24 December 2014

Mortal

Death is a mystry no body gonna answer
Dig more in your soul, it take you to farther
Talk to your father, Think about the Karma
I grind harder but this world is so possessed
When I stop living for others
I should stop living for my self
But i ll be there whenever u need any help
Better see myself as Book in the shelf than goon with the wealth
Not to take the ransom but to play with any grandson
Like kalam said on being handsome if u give hand to some
Just shun condemn those politicians livin in mansion
Divorse is yours, but how ur kid live with a step mom?
I wanna trigger happiness and wisdom is the gun
Not preaching but i actually want to be one
And thats what i'll teach it to my son
Never prevail the hate
Sorry! I lf i ever hurt you
Talk to me, unless you feeling like Curfew
Let you know about the sacred than prevailing hatred
t-shirt shed red in extremist trap race
Stop embracing your religion, caste you born into
Stop embracing your mother who born you
Everybody have the problem they been gone thru
Become "Yourself" if any celeb that you want to
U ll become one if your put your heart into
Never look back cause the black ghost frost you
Like those granny lullaby told you
You become one how life fold you
You become one how life bold you

[img source : http://khalidsnowden.files.wordpress.com]

Wednesday, 10 December 2014

उन मुलाक़ातो के धब्बे

कुछ गीले-शिकवो की गठरीया छोड़ आया था उसी दरख़्त के छाँव मे रखी बेंच पे जहा आख़िरी बार हम मिले थे! सुना है अब वहाँ आता जाता भी नही है कोई! वो जो दरख़्त था ना, वो भी बूढ़ा हो गया है और बेंच पे अब बस धूल ही बैठा करती है! बड़ी मायूस और सुनसान रहती है वो जगह! कभी कभार गुज़रता हूँ तो मुझसे हज़ार तरीके के सवाल पूछा करती है! पहले तो घूरती है मुझे, जैसे गुस्सा हो, नाराज़ हो! मुँह-फूला करके नाराज़ बैठ जाती है! पर फिर वहा के किरायेदार 'सन्नाटे' से, मायूसी और खोखलापन ज़ाहिर हो ही जाता है!

 तरह-तरह के बहुत सारे सवाल पूछा करती है, जैसे तुम पूछा करती थी! याद है ना? पता नही बहुत अरसा बीत गया है शायद याद-दाश्त से गुज़र गया हो! या शायद याद-दाश्त के उधदे गदेलो पर नयी ज़िंदगी की साफ-सुधरी नयी डिज़ाइन वाली चादर बिछा दी हो और उसकी चारो कोरे मोढ़ दी हो ताकी उन गदेलो का उड़ा हुआ रंग और फटते हुए रूहे जो झाँकते है पुर्जो से निकल कर, उन पर नज़र ना पड़े! कभी पानी की तरह गुड-मूड होके एक तरफ हो जाते है! एसा कभी-कभार  हमारे रिश्ते मे भी हुआ करता था, तुम सारा गुस्सा अपनी तरफ ले लिया करती थी और मेरी तरफ सिर्फ़ ख़ालीपन बचा रहता था! यही सोच कर फिर मे आगे बढ़ जाता हूँ उस जगह को "अपना ख़याल रखना" और "ज़िंदगी रही तो मिलेंगे" कहके!



Tuesday, 21 October 2014

लफ्ज़

बड़ा घिसा था पेन को मेने अंधेरे से घुलसी उस चाँद के रोशनी मे! एक अजीब से उत्साह उकरने लगता है लिखते-लिखते के रात का पता लापता-सा हो जाता था और मुझे कोई फरक भी नही पड़ता..मे बेहोश मदहोश..अपने ख्यालो की मौजो मे कश्ती ताएराता रहता.. मे बस एक बेबाक बेधड़क सिपाही की तरह अल्फाज़ो को आज़ाद करके..उन्हे काग़ज़ पे काली स्याही के सुलझने वाले गुच्छे बना लेता था! 

ज़्यादातर जुड़ने वाले लफ्ज़ मेरे ज़िंदगी के दफ़्न हुए वकीये होते थे!

पर आजकल अजीब सा खाल है.. मेरी ज़िंदगी को लेकर.. रूठ गये है.. वो क़लम, वो काग़ज़ और वो ख़याल मुझसे.. ना जाने क्यूँ दस्तक ना देते अकेलेपन मे मेरा.. क्या धोखा दिया मेने या बेवफा कर दिया उसे जज़्बे के प्यार को! नफ़रत नही है.. शायद वक़्त से डर गये है..और चुप के बैठे है किसी कोने मे!
मे भी वाकिफ़ हू और जाहिल हू के इस तालीम मे अपनी खूबी को पीछे कही छोड़ता जा रा हूँ!
फिर वापस एक माचिस की तिल्ली जालायी है..इसी के घरोंधे मे और वादा है मेरा ख़यालो से के भरे गुबारो की तरह यू ही आसमान मे गायब ना होने दूँगा.. बना लूँगा एक तस्वीर तुम्हारी काग़ज़ो मे अक्सर!


Friday, 3 October 2014

बारिश के रूहे

आप कभी हारते या जीत ते नही हूँ बारिश मे भीग के! बस आप भीगते हूँ! एक वक़्त के लिए सब कुछ भूल जाते हो!कितने सवाल, खायल उस वक़्त से पहले होते है! जैसे सारी सड़के और छत धूल जाती है वैसे ही वो ख्याल सवाल धूल जाते है! कुछ वक़्त के लिए आप ऑफीस और घर की परेशानियो से कही दूर चले जाते हो! बहुत दूर! शायद यही लम्हा ज़िंदगी होता है! आप कुछ सोचते नही सिर्फ़ महसूस करते हो!

Thursday, 21 November 2013

Leave Me Alone

Today, i came home late from as i dispend from my office work lately. I feels so much low that i dont want to even check my messages on cellphone and other apps. And next moment, i left my cell and kept aside and lighten my pocket. On that moment, i just want to get be alone . No one to querral, shout, ditch, but myself. So, i left unchanged and clinches to the top floor edge. The wave and smell of the air,.the dim moonlight and the low decibels of noise. In the entire atmosphere of calmness and lone numbness, the only person with me is me itself.Seems like something all the trauma and tensions of yours and your world is blowing up with the waves of slow accelating air. And then i broke my own silence and started chattering the most trustful person of my life ME.
we talked about the childhood, the changes in me, how could i be a jerk in schools, the days and the opportunity that i missed and i wish i could laid back. We also talked about future, family expectations, memoirs.
Its nice talking to him and then stand straight up and shout out to him and he also replied back with the echo.
Seriously , like me, we all need a break. Not to be with everyone bit with someone you daily saw on mirror and not even greet to him. We all need some personal space to analyse our own happiness and frantic sorrows.