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Monday, 9 February 2015

उजाला नही

ग़लती की थी वो लिखे हज़ार खत तुम्हारे हवाले ना सही आग के हवाले कर दिए थे.
बस यही सोचकर के सोच तो मिलती नही है ज़िंदगी कैसे मिलेगी :)

अब समझ मे ये नही आता. उन खातो के बुरादो का क्या करू जिस की जलाई हुई यादे अभी तक सवाल तलाश करती है.

वो कहते है ना आँखे बंद करते हो तो अंधेरा आता है उजाला नही...

Sunday, 11 January 2015

प्यार करे

रंजिशे-ए-सरहद को छोड़ो, चलो एत्तेहाद करे,
प्यार करे.
निगाहो से गिरादे दफ़तन रंजिशो के पर्दे..
इज़हार करे,
प्यार करे.
मोहब्बत मे कहा देखे जाते ऩफा-नुकसा(न)
एतबार करे,
प्यार करे.

एक फिराक़

सबका पता नही पर ज़्यादातर लोग एक उम्र मे आके कही अंजान जगह मे भाग जाने की साची फिराक़ मे रहते है.. खैर, वो शायद दिलो के खलिश को शब्दो मे ज़ाहिर नही कर पाते पर अंदर एक बवंडर पनपता रहता है. पर क्या करे..रिश्ते, मजबूरियो की बेड़िया बंदिशे बनकर एक पिंजरे तक मे जीने की आज़ादी देते है. वो आज़ादी जो मूह पर हँसी लेपने की बुरी आदत भी सीखा देती है. आजिसी का दरिया कभी करवाते पलट ता थोड़ी है.
काश गुमनामी का कोई समुंदर होता और उमसे गोते लगाकर डूब जाना भी आसान होता. तो गुम हो जाते एक अपनी-अपनी कहकशाओ मे.

और हां! ये अंदर की बात है किसी को बताना नही. श्श्श्!!

Saturday, 27 December 2014

प्यार निशब्द

प्यार कही भी और कभी भी पनप सकता है..
इश्क़ की अंकुरित बीज कही भी कोपल बन सकते है..
प्यार को पानी की संगया भी दे सकते है..
कही भी जगह बना है..
कही भी पल जाए..
और ज़रूरत पड़े तो बवाल भी बन जाए.
प्यार जिससे ना विज्ञान सुलझा पाया है.. ना कोई ग्यानि..
और ना समाज समझ पाया है..

प्यार खूबसूरत है और खूबसूरती नही देखता..
ना तराश्त है लफ्ज़..
सच कहते है प्यार अँधा होता है.. देखा सुना नही जा सकता..
सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है.. आहट पहचानता है..
बस जहा जगह दर्याफ़्त होती है.. जो वही रिस्ता जाता है..
नया रिश्ता बनता रहता है.
ईत्र है. एक मदहोशी है.
एक ख्वाब है.. और उसकी तबीर है.
रोग भी है. इलाज भी है.
ज़ख़्म भी है.. इजात है.

भूल जाता है कौनसा जिस्म पहना हुआ है..  कौनसी जात औडी है..
तब दुनिया मे सिर्फ़ दो नही..
एक ही जिस्म बाकी रह जाता है.. और उसी मे घुले हुए हिस्से.
शिकायते भी नही करता.
खामोशी को पढ़ता है.
आहट को सुनता है.

ऐसा ही होता है प्यार, बस ऐसे ही होता है प्यार!

[Img source : https://img0.etsystatic.com/012/0/6673596/il_570xN.444067078_abqv.jpg]

Thursday, 1 August 2013

बस यू ही

सुकून की झपकी.
हवा की मासूमियत को सांसो मे क़ैद कर लेना.
बस कुछ यूँ ही बैठे बैठे,
चिंटी के फलसफ़ॉ को ताड़ना बे शाबिस्ता,
दिल की खिड़की से ज़िंदगी को झाखना
आपने आँखो से खूबसूरत नज़ारे क़ैद कर लेना,
बिखरी यादो को समेटना.
ताक कर चाँद को
ज़ाहिर कर देना सारे राज़,
एक दोस्त एक राज़दार के मानिंद,
काश एक पल ठेहेर कर,
सब्र कर,
बस यू ही बे मतलब से लम्हे,
फिकर और रंजिशो की दुनिया
के साए से कही दूर चलकर देखो 
कुछ बिलवाजह की छायो मे
कभी सेर हो जाए बे-ख्वाइश तरानो मे
धड़कनो को धीमा कर,
कुछ मुस्कुराहट आज़ाद करके ठहाको की गूँज से
अपने दिल मे नयी गर्माहट को आव देना
कभी दुपककी लगाए बिना ज़ोर-आज़माइश के
यू ही!!
हवा की सरसराहट
सूरज की गर्माहट
पानी के छींटे
काग़ज़ो की बुज़ुर्गियत को बे वजह चूम के द्देखो
बस यू ही.
बे वजह
बे मतलब!

खीज़र्

Monday, 29 July 2013

वो स्याह सी किताब मेरी

वो स्याह सी किताब मेरी..
सतरंग लफ्ज़ भारी..

कहने को काग़ज़ के वर्के है
पर उसमे दिन हाल के चर्चे है
मीठी सी गुफतु गु
गर्द गुलाब की खुश्बू..
सुनहेरे अल्फ़ाज़..
कब्र गाड़े राज़..
खुशियो भरे मौसम..
दिल मे खल की चुभन..
वो मील के पत्‍थर सारे..
कड़वे और तेज़ चटखारे..
और भी अलग अंदाज़ है..
नज़्म और शायरी जो दिल के बहुत ख़ास है..
यारो के रंगीन से किससे..
ज़िंदगी के संगीन के हिस्से..
हालात की आँधी मे लगती ढलान..
और जब था मे खुद से अंजान..

ये वो बाते है जो लिखी मेने
ठंडी हवा के झोंको मे
गर्दिश के मौको मे..
सुकून की झलक मे..
जज़्बातो की ललक मे..
छज्जे पे – डॉली पे..
जुंग की गोली पे..
वीरान सी तन्हाई मे..
भीड़ की परछाई मे..

वो स्याह सी किताब मेरी..
सतरंग लफ्ज़ भारी..

वो स्याही नही मेरा परवाज़ है..
उसने बहे मेरे अल्फ़ाज़ है..
वो स्याही मेरी माचिस है..
जिसकी तीली से रोशन मेरा खाली पं है.
अंधेरे मे भी कुछ है..
वो मेरी आँखो का आवारापन है..
वो स्याही मुस्कुराहट है मेरी..
वो काग़ज़ चाहत है मेरी..

वो स्याह सी किताब मेरी..
सतरंग लफ्ज़ भारी..

खीज़र