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Sunday, 15 February 2015

आँखे

ये आँखो मे राज़ तुम तमाम रखती हो.
एक कहकशा रखती हो.
एक इल्ज़ाम रखती हो.
मे लिख लेता हूँ नज़्म अक्सर तुम्हारी तारीफ मे टूटी फूटी.
मे तो बयान ही नही कर पता क्या तुम मुकाम रखती हो.
वैसे तो खिलाफत ए ज़ुल्म हूँ मे पर
ये आँखो के सूरमे से हमे अपना गुलाम रखती हो.!

Wednesday, 14 August 2013

जो कहता हूँ वो बात पुरानी लगती है

यू तो हर रोज़ कहानी मिलती है.
जो कहता हूँ वो बात पुरानी लगती है



हर आदमी बुलबुला सा दिखता है
लहरो पे समुंदर नाम मोहब्बत लिखता है
किताबो मे दबे गुलाब सुर्ख हो गये..
रोटी हुई आँखो पे अब झूर्र सो गये..
यू तो हर रोज़ कहानी मिलती है.
जो कहता हूँ वो बात पुरानी लगती है

वो झड़के गिरा पत्ता खुद पेड़ बन गया.
बचपन की मौज अब खेल बन गया.
धीमी सी तफ़्टार यू तेज़ हो गयी
गीली मेहन्दी के हाथ रंग्रेज़ हो गयी.
बुलंद वो आवाज़ आज भी बुलंद है.
उन आँखो मे आज भी वही घमंड है..
सीना तान के बच्चे पन्ने पलटते है..
वो क़िस्से आज भी अलाव पे जलते है..
शान से साँसे खिलती है..
यू तो हर रोज़ कहानी मिलती है.
जो कहता हूँ वो बात पुरानी लगती है

खिज़र


Saturday, 3 August 2013

मेरा नाम क्या था?

मेरा नाम क्या था?
मे भी खुद को भूल गया..
मुझे शायद गर्व है मुझपे..
क्यूँ की मे खुश हूँ अपने घर से..
वो गलियो की चहल-पहेल
वो बातो मे देश –सड़क
वो शोर की उथल- पुथल
मेरी ज़िंदगी मे घुल गया.
मेरा नाम क्या था?
मे खुद भी मुझको भूल गया..

नही शौक किसी शौक का..
ना होश किसी बोझ का..
हवा की जैसे उड़ती पतंग..
छोटी गुदगुदी से नाचे मन..
मालूम नही क्या होता घमंड..
खुश है जेब मेरी थोड़े से वज़न से
नीले गगन से
रहे ना किसी बात की फिकर
मिला मुझे वक़्त का समुंदर
मेरी पहचान से मेरा चेहरा छूट गया

मेरा नाम क्या था?
मे खुद भी मुझको भूल गया

खीज़र्

Thursday, 1 August 2013

बस यू ही

सुकून की झपकी.
हवा की मासूमियत को सांसो मे क़ैद कर लेना.
बस कुछ यूँ ही बैठे बैठे,
चिंटी के फलसफ़ॉ को ताड़ना बे शाबिस्ता,
दिल की खिड़की से ज़िंदगी को झाखना
आपने आँखो से खूबसूरत नज़ारे क़ैद कर लेना,
बिखरी यादो को समेटना.
ताक कर चाँद को
ज़ाहिर कर देना सारे राज़,
एक दोस्त एक राज़दार के मानिंद,
काश एक पल ठेहेर कर,
सब्र कर,
बस यू ही बे मतलब से लम्हे,
फिकर और रंजिशो की दुनिया
के साए से कही दूर चलकर देखो 
कुछ बिलवाजह की छायो मे
कभी सेर हो जाए बे-ख्वाइश तरानो मे
धड़कनो को धीमा कर,
कुछ मुस्कुराहट आज़ाद करके ठहाको की गूँज से
अपने दिल मे नयी गर्माहट को आव देना
कभी दुपककी लगाए बिना ज़ोर-आज़माइश के
यू ही!!
हवा की सरसराहट
सूरज की गर्माहट
पानी के छींटे
काग़ज़ो की बुज़ुर्गियत को बे वजह चूम के द्देखो
बस यू ही.
बे वजह
बे मतलब!

खीज़र्

Monday, 29 July 2013

वो स्याह सी किताब मेरी

वो स्याह सी किताब मेरी..
सतरंग लफ्ज़ भारी..

कहने को काग़ज़ के वर्के है
पर उसमे दिन हाल के चर्चे है
मीठी सी गुफतु गु
गर्द गुलाब की खुश्बू..
सुनहेरे अल्फ़ाज़..
कब्र गाड़े राज़..
खुशियो भरे मौसम..
दिल मे खल की चुभन..
वो मील के पत्‍थर सारे..
कड़वे और तेज़ चटखारे..
और भी अलग अंदाज़ है..
नज़्म और शायरी जो दिल के बहुत ख़ास है..
यारो के रंगीन से किससे..
ज़िंदगी के संगीन के हिस्से..
हालात की आँधी मे लगती ढलान..
और जब था मे खुद से अंजान..

ये वो बाते है जो लिखी मेने
ठंडी हवा के झोंको मे
गर्दिश के मौको मे..
सुकून की झलक मे..
जज़्बातो की ललक मे..
छज्जे पे – डॉली पे..
जुंग की गोली पे..
वीरान सी तन्हाई मे..
भीड़ की परछाई मे..

वो स्याह सी किताब मेरी..
सतरंग लफ्ज़ भारी..

वो स्याही नही मेरा परवाज़ है..
उसने बहे मेरे अल्फ़ाज़ है..
वो स्याही मेरी माचिस है..
जिसकी तीली से रोशन मेरा खाली पं है.
अंधेरे मे भी कुछ है..
वो मेरी आँखो का आवारापन है..
वो स्याही मुस्कुराहट है मेरी..
वो काग़ज़ चाहत है मेरी..

वो स्याह सी किताब मेरी..
सतरंग लफ्ज़ भारी..

खीज़र




Friday, 26 July 2013

कौन हूँ मे?

कौन हूँ मे?
कुछ ख़याल नही..
कुछ सवाल नही..
चुप हूँ मे..कुछ आवाज़ नही
जैसे बहता पानी शांत
पत्थर से ठोकर खाने के बाद..
उलझी कहानी और गुच्छे जैसे ख़याल
साँसे भी रवा जैसे डूबा कोई बुलबुला..
शुरुवत की झिझक और शुरूवात का ना अंत हुआ..
अंजान हूँ मे अपनी लगान से..
गुम हूँ में अजीब से सफ़र मे..
सपने भी देखे रोज़ आँखे बदलके.
पर में बेहोश हू बेज़ार हलातो मे..
मेरा ना कोई वजूद.. 
बड़ा रहा हू कोख मे मोजूद..
नये बीज डाले है खेत मे..
कोई सेलाब शायद समेटा बैठा हूँ..
हाथो मे लकीरो के बदले कल कहता हूँ..
फिर भी ज़िंदगी क़ानून मे..
कौन हूँ मे?
क्या हूँ मे?