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Sunday, 15 February 2015

आँखे

ये आँखो मे राज़ तुम तमाम रखती हो.
एक कहकशा रखती हो.
एक इल्ज़ाम रखती हो.
मे लिख लेता हूँ नज़्म अक्सर तुम्हारी तारीफ मे टूटी फूटी.
मे तो बयान ही नही कर पता क्या तुम मुकाम रखती हो.
वैसे तो खिलाफत ए ज़ुल्म हूँ मे पर
ये आँखो के सूरमे से हमे अपना गुलाम रखती हो.!

Tuesday, 12 November 2013

मुसाफिर

यू राह को हमसफर समझे मुसाफिर
क़ैद आँखो मे नज़ारे
और घर लगे काफ़िर
में भी लाँघ अपनी सीमा तोड़,
निकल गया कदमो से दुर
मंज़िल नही मेरी राह है फितूर
भागा सपनो की तलाश मे
तन्हा लहराता एक –पंछी बे आस मे
उड़ने से पहले मुझे तोड़ा दर है.
संबे उड़ान तो सफ़र बे सब्र है
चाहे चेहरे बदल रहे
लम्हे सारे फिसल रहे
कोई तेरा नही सागा है
ये जो साथी मुझे मिला है
दूरियो पे ख़तम इनका सिला है
जैसे रेत के वक़्त है ज़्यादा
कोई और भी है
जिससे इंतेज़ार करे वो एलहदा!



DISCLAIMER : the following post is been posted for the IndiBlogger.com and Tata Safari Contest : I' Am Explorer! 

for More Information : Tata Safari


Wednesday, 14 August 2013

जो कहता हूँ वो बात पुरानी लगती है

यू तो हर रोज़ कहानी मिलती है.
जो कहता हूँ वो बात पुरानी लगती है



हर आदमी बुलबुला सा दिखता है
लहरो पे समुंदर नाम मोहब्बत लिखता है
किताबो मे दबे गुलाब सुर्ख हो गये..
रोटी हुई आँखो पे अब झूर्र सो गये..
यू तो हर रोज़ कहानी मिलती है.
जो कहता हूँ वो बात पुरानी लगती है

वो झड़के गिरा पत्ता खुद पेड़ बन गया.
बचपन की मौज अब खेल बन गया.
धीमी सी तफ़्टार यू तेज़ हो गयी
गीली मेहन्दी के हाथ रंग्रेज़ हो गयी.
बुलंद वो आवाज़ आज भी बुलंद है.
उन आँखो मे आज भी वही घमंड है..
सीना तान के बच्चे पन्ने पलटते है..
वो क़िस्से आज भी अलाव पे जलते है..
शान से साँसे खिलती है..
यू तो हर रोज़ कहानी मिलती है.
जो कहता हूँ वो बात पुरानी लगती है

खिज़र


Saturday, 3 August 2013

मेरा नाम क्या था?

मेरा नाम क्या था?
मे भी खुद को भूल गया..
मुझे शायद गर्व है मुझपे..
क्यूँ की मे खुश हूँ अपने घर से..
वो गलियो की चहल-पहेल
वो बातो मे देश –सड़क
वो शोर की उथल- पुथल
मेरी ज़िंदगी मे घुल गया.
मेरा नाम क्या था?
मे खुद भी मुझको भूल गया..

नही शौक किसी शौक का..
ना होश किसी बोझ का..
हवा की जैसे उड़ती पतंग..
छोटी गुदगुदी से नाचे मन..
मालूम नही क्या होता घमंड..
खुश है जेब मेरी थोड़े से वज़न से
नीले गगन से
रहे ना किसी बात की फिकर
मिला मुझे वक़्त का समुंदर
मेरी पहचान से मेरा चेहरा छूट गया

मेरा नाम क्या था?
मे खुद भी मुझको भूल गया

खीज़र्

Friday, 26 July 2013

कौन हूँ मे?

कौन हूँ मे?
कुछ ख़याल नही..
कुछ सवाल नही..
चुप हूँ मे..कुछ आवाज़ नही
जैसे बहता पानी शांत
पत्थर से ठोकर खाने के बाद..
उलझी कहानी और गुच्छे जैसे ख़याल
साँसे भी रवा जैसे डूबा कोई बुलबुला..
शुरुवत की झिझक और शुरूवात का ना अंत हुआ..
अंजान हूँ मे अपनी लगान से..
गुम हूँ में अजीब से सफ़र मे..
सपने भी देखे रोज़ आँखे बदलके.
पर में बेहोश हू बेज़ार हलातो मे..
मेरा ना कोई वजूद.. 
बड़ा रहा हू कोख मे मोजूद..
नये बीज डाले है खेत मे..
कोई सेलाब शायद समेटा बैठा हूँ..
हाथो मे लकीरो के बदले कल कहता हूँ..
फिर भी ज़िंदगी क़ानून मे..
कौन हूँ मे?
क्या हूँ मे?