Showing posts with label lost. Show all posts
Showing posts with label lost. Show all posts

Wednesday, 10 December 2014

उन मुलाक़ातो के धब्बे

कुछ गीले-शिकवो की गठरीया छोड़ आया था उसी दरख़्त के छाँव मे रखी बेंच पे जहा आख़िरी बार हम मिले थे! सुना है अब वहाँ आता जाता भी नही है कोई! वो जो दरख़्त था ना, वो भी बूढ़ा हो गया है और बेंच पे अब बस धूल ही बैठा करती है! बड़ी मायूस और सुनसान रहती है वो जगह! कभी कभार गुज़रता हूँ तो मुझसे हज़ार तरीके के सवाल पूछा करती है! पहले तो घूरती है मुझे, जैसे गुस्सा हो, नाराज़ हो! मुँह-फूला करके नाराज़ बैठ जाती है! पर फिर वहा के किरायेदार 'सन्नाटे' से, मायूसी और खोखलापन ज़ाहिर हो ही जाता है!

 तरह-तरह के बहुत सारे सवाल पूछा करती है, जैसे तुम पूछा करती थी! याद है ना? पता नही बहुत अरसा बीत गया है शायद याद-दाश्त से गुज़र गया हो! या शायद याद-दाश्त के उधदे गदेलो पर नयी ज़िंदगी की साफ-सुधरी नयी डिज़ाइन वाली चादर बिछा दी हो और उसकी चारो कोरे मोढ़ दी हो ताकी उन गदेलो का उड़ा हुआ रंग और फटते हुए रूहे जो झाँकते है पुर्जो से निकल कर, उन पर नज़र ना पड़े! कभी पानी की तरह गुड-मूड होके एक तरफ हो जाते है! एसा कभी-कभार  हमारे रिश्ते मे भी हुआ करता था, तुम सारा गुस्सा अपनी तरफ ले लिया करती थी और मेरी तरफ सिर्फ़ ख़ालीपन बचा रहता था! यही सोच कर फिर मे आगे बढ़ जाता हूँ उस जगह को "अपना ख़याल रखना" और "ज़िंदगी रही तो मिलेंगे" कहके!



Friday, 26 July 2013

कौन हूँ मे?

कौन हूँ मे?
कुछ ख़याल नही..
कुछ सवाल नही..
चुप हूँ मे..कुछ आवाज़ नही
जैसे बहता पानी शांत
पत्थर से ठोकर खाने के बाद..
उलझी कहानी और गुच्छे जैसे ख़याल
साँसे भी रवा जैसे डूबा कोई बुलबुला..
शुरुवत की झिझक और शुरूवात का ना अंत हुआ..
अंजान हूँ मे अपनी लगान से..
गुम हूँ में अजीब से सफ़र मे..
सपने भी देखे रोज़ आँखे बदलके.
पर में बेहोश हू बेज़ार हलातो मे..
मेरा ना कोई वजूद.. 
बड़ा रहा हू कोख मे मोजूद..
नये बीज डाले है खेत मे..
कोई सेलाब शायद समेटा बैठा हूँ..
हाथो मे लकीरो के बदले कल कहता हूँ..
फिर भी ज़िंदगी क़ानून मे..
कौन हूँ मे?
क्या हूँ मे?



Wednesday, 17 July 2013

पतंग


एक लड़का है पागल सा।
दिमाग उका जंगल सा।
रहते उसमे उलझन और सवाल।
पर उसकी पतंग है उसकी मशाल।
वो चिंगारी का खज़ाना है।
पर उससे अभी तक न किसी ने जाना है।
उसने न मंझा लूटा है।
वो खुद कांच की तरह टूटा है।
उम्मीद उसका आसमान है।
लेकिन वो तनहा है।
आँखों में चमक और हलकी सी मुस्कान है।
उसकी पतंग उसकी शान है।
वो दिखने में पतला थोडा नादान है।
पर उसकी पतंग उसकी शान है।
पर उसकी पतंग उसकी शान है।

ना उसको भूख की फिकर।
न सिमटा उसका जिगर।
बदलो के आगे उसके निशाँ है।
उसकी पतंग उसकी शान है।


वो ज़मीन से जुदा है।
वो  हालातो  से मुढ़ा है।
वो लकीरों को नहीं जानता।
वो किस्मत को नहीं मानता।
वो अंधेरो में रोता है।
वो सपनो में न खोता है।
वो पत्थर नहीं पानी है।
मतलबी मज़ा उसके लिए बेमानी है।
वो जानता है ऊँची उसकी उड़ान है।
उसकी पतंग उसकी शान है।
उसकी पतंग उसकी शान है।
उसकी पतंग उसकी शान है।