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Wednesday, 17 July 2013

पतंग


एक लड़का है पागल सा।
दिमाग उका जंगल सा।
रहते उसमे उलझन और सवाल।
पर उसकी पतंग है उसकी मशाल।
वो चिंगारी का खज़ाना है।
पर उससे अभी तक न किसी ने जाना है।
उसने न मंझा लूटा है।
वो खुद कांच की तरह टूटा है।
उम्मीद उसका आसमान है।
लेकिन वो तनहा है।
आँखों में चमक और हलकी सी मुस्कान है।
उसकी पतंग उसकी शान है।
वो दिखने में पतला थोडा नादान है।
पर उसकी पतंग उसकी शान है।
पर उसकी पतंग उसकी शान है।

ना उसको भूख की फिकर।
न सिमटा उसका जिगर।
बदलो के आगे उसके निशाँ है।
उसकी पतंग उसकी शान है।


वो ज़मीन से जुदा है।
वो  हालातो  से मुढ़ा है।
वो लकीरों को नहीं जानता।
वो किस्मत को नहीं मानता।
वो अंधेरो में रोता है।
वो सपनो में न खोता है।
वो पत्थर नहीं पानी है।
मतलबी मज़ा उसके लिए बेमानी है।
वो जानता है ऊँची उसकी उड़ान है।
उसकी पतंग उसकी शान है।
उसकी पतंग उसकी शान है।
उसकी पतंग उसकी शान है।