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Friday, 13 February 2015

एक वक़्त ऐसा भी था

एक वक़्त था मेरे बचपन का, जब हम मोबाइल, टेबलेट, लॅपटॉप से अंजान से और कंप्यूटर के नाम पे सिर्फ़ Solitaire और M S Paint एस्तेमाल करते थे और वही जानते थे. पर ना आजकल की तरह "बोर हो रहा हू!" वाला पेट डाइलॉग नही हुआ करता था. तब चाहे देश और हम टेक्नालजी मे कम थे पर वक़्त के मामले मे बड़े अमीर हुआ करते थे.
मे तोड़ा बहुत पैसे बचा के कॉमिक्स लाया करता था, कही जगह पे तो रेंट पे भी मिलती थी और घर पर बाल-भास्कर छोटू-मोटू ब बहुत सारी इकखट्टा हो गयी थी महीने-दर-महीने तो पहले जो मे खरीद लेता था..उसी अंतराल के आख़िरी दीनो मे कॉमिक्स रेंट पे लाया करता था. बहेरहाल, वो चाचा चौधरी की कहानिया जिनका दिमाग़ कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है, साबू की ताक़त, बिल्लू जैसा तो मे बड़ा होके बनना चाहता था. उसके साइकल पे स्टंट कॉपी करने के चक्कर मे हाथ पैर तुढवा के आया..पिंकी बड़ी सयानी थी, नागराज, फॅनटम दुश्मनो को मार डालते थे. चंपक. बालहंस. और ना जाने क्या क्या! एक मज़ेदार से दुनिया थी वो भी. और सब मिल कर एक दूसरे को किससे सुनाया करते थे! ये हुआ वो हुआ और कॉमिक्स एक्सचेंज हुआ करती थी.

शेख चिल्ली के किससे, अकबर-बीरबा, पंचतंतरा.. बोरियत तो अब होती है सब कुछ है अपने पास!

पहले पढ़ाई के नाम पे शायद न सी ई र टी की पतली-पतली किताबे थी पर समझदारी और संजीदगी के लिए बहुत कुछ हुआ करता था. ना कोई डबल मीनिंग ना गंदे जोक्स. बस Time-pass के लिए मज़ेदार और रोमांचक किससे कहानिया.

Monday, 9 February 2015

उजाला नही

ग़लती की थी वो लिखे हज़ार खत तुम्हारे हवाले ना सही आग के हवाले कर दिए थे.
बस यही सोचकर के सोच तो मिलती नही है ज़िंदगी कैसे मिलेगी :)

अब समझ मे ये नही आता. उन खातो के बुरादो का क्या करू जिस की जलाई हुई यादे अभी तक सवाल तलाश करती है.

वो कहते है ना आँखे बंद करते हो तो अंधेरा आता है उजाला नही...

Wednesday, 17 December 2014

चौराहे पर सीडीया : संजीदा पर उदासीन

कुछ हफ्ते पहले फ्लिपकार्ट पर यूँ ही घूमते हुए मेरे मन मे ना जाने कैसे हिन्दी से वापस परिचित होने का मन किया और मैं वेसे ही हिन्दी नॉवेल्स की सुनसान सी भीड़ मे पहुँच गया! थोड़ा स्क्रोल किया तो एक नॉवेल के शीर्षक और उसके कवर के चित्र ने मुझे सम्मोह लिया, जैसे मैं उसी को ही खोज रहा था! कीशोर चौधरी की लघु कहानिया की पुस्तक - "चौराहे पर सीडीया" बहुत सालो बाद मुझे हिन्दी सहित्य की उन बिछड़ी हुई गलिया मे ले गयी जहाँ कभी मुंशी प्रेम चन्द जी ज़हन को टेहलया करते थे! थोड़ा बहुत नवीनता का वॉर्क चड़ा हुआ है पर वो भी सहित्य पर हावी नही हुआ! साहित्यकार की सारी कहानियो मे उदासीनता एक आम ज़मीन की तरह है! पर कहानिया होकर भी एक नही लगती, सबमे अलग दर्पण है, अलग पहलू है! देखा जाए तो वक़्त को रोक कर गहरे निंदन के बाद हर एक एहसास और हर एक पहलू की गहराई मे जा कर लिखा गया है! कहानिया मे उत्पीड़न,छल-कपट और पीड़ा के साथ साथ ज़हन मे आनी वाली हर दुविधा को बखूबी काग़ज़ पर लिखा गया है! कुछ एक कहानी सुख और हॅसी पर तो सही पर वो हॅसी भी नही, ज़िंदगी पर कसे व्यंग है या फिर तूफान के बाद की शांति है!
वैसे मे भी राजस्थान - जैपुर का निवासी हूँ तो भाषा मेरे लिए व्यावहारिक सी ही है पर भाषा के मामले मे मोज़ार्ट है पर कीशोर साब! हर एक शब्द बखूबी अपनी एहमियत रखता है और हर एक दर्द को जुऊँ-से-त्यु सामने लता है!! कहानियो मे राजस्थान की खुश्बू और गाँव की जीवन शैली को भी बखूबी दिखलाया गया है!
सारी कहानिया भाषा की धनी है, भावना से पूर्ण है पर कहानिया अधूरी है, पीड़ा है उनमे!

अगर आप सिर्फ़ मसाला कहानियो को पढ़कर चटखारे लेना चाहते है तो ये किताब उस तरह की नही है! दिल से अगर पूछ पूछ कर पढ़ेंगे तो ज़हन मे बैठ जाएगी ये किताब!
अभी तक इस किताब का शीर्षक और कवर पेज मेरे ज़हेन मे उलझा हुआ सा है!